July 27, 2020

बरनावद के द्वापरयुगीन शिवधाम से जानिए मंगलनाथ का अर्थ.

शाजापुर- Story By Nitesh Suryavanshi and Shivam Sharma

शाजापुर जिले के अन्तर्गत आने वाले बरनावद गांव में प्राचीन काल से ही भगवान भोलेनाथ अपने मंगलनाथ स्वरूप में अवस्थित है. मंदिर के पुजारी देवीसिंह जी योगी एवं गांव के वरिष्ठ लोगों के अनुसार मंदिर का शिवलिंग प्राचीन काल से ही यहां अवस्थित है , परन्तु मंदिर के मौलिक या प्रारम्भिक स्वरूप का निर्माण आज से लगभग 64 वर्ष पूर्व सन् 1956-57 (विक्रम संवत् २०१३) के करीब पुजारी देवीसिंह जी के नानाजी के वंशजों ने करवाया था. मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण सन् 2018 में समस्त गांववासियों के सहयोग से किया गया है ।

मंगलनाथ का अर्थ
मंगलग्रह जीवन में ऊर्जा के वेग को प्रदर्शित करता है , भीतर के क्रोध और उत्साह को प्रदर्शित करता है ,शिव उसका नियंत्रण करते है , इसी कारणवश उन्हें “मंगलनाथ” कहा जाता है। शिव स्वयंभू है ,अर्थात वे स्वयं से प्रकट है इसी आधार पर उनकी ऊर्जा का स्रोत भी वे स्वयं है , परन्तु उनके द्वारा उस ऊर्जा का नियंत्रण किया गया है ।

पांडवो द्वारा पूजित है शिवलिंग

प्राचीन कथाओं से यह माना जाता है कि पांडवो के वनवास के समय वो इस स्थान से गुजरे थे तथा यहां भगवान शिव का पूजन किया था तथा इसके पश्चात वे नलखेड़ा स्थित माँ बगुलामुखी माता मंदिर में गए थे.

Photo By Shivam Sharma

मंदिर में स्थित है त्रिमूर्ति का अद्भुत स्वरूप
मंदिर के प्रांगण में नीम , बरगद , पीपल के वृक्षों का संग है जो त्रिमूर्ति अर्थात ब्रह्मा , विष्णु , महेश का स्वरूप है । प्रांगण में अवस्थित बरगद का प्राचीन वृक्ष अपनी प्राचीनता और विशालता से मंदिर की शोभा बढ़ाता है ।

गांव के बाहर स्थित है मंदिर.
शिव पूर्ण है ,इसीलिए उन तक पहुंचने के लिए हमे प्रकृति से हट कर सोचना होगा । शिव संसार के सार भी है और स्वयं संसार से परे भी है । भौतिकता से उपर उठकर ही शिव की सच्ची भक्ति की जा सकती है ।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।।

इस अलौकिक मंत्र के प्रत्येक शब्द में भगवान शिवजी की स्तुति की गई हैं । इसका अर्थ इस प्रकार है- कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले । करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं । संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं । भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं । सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है ।

भक्तों के मन को शांति पहुंचता है यह प्राचीन देवस्थान
इस प्राचीन मंदिर में भक्तों का आना जाना बना ही रहता है । यहां आने वाले भक्तों के अनुसार यहां शिव के धाम में आकर दुनियादारी की उलझनों से कुछ समय के लिए मुक्ति मिल जाती है तथा मन को शांति का अनुभव होता है ।

बिना किसी लोभ और लालच भगवान शिव की पूजा में लीन रहने वाले पुजारी देवीसिंह योगी जी के अनुसार –

“मेरा जीवन ही भगवान की सेवा में गुजरे मेरे लिए यही सबसे कीमती चीज है ।”

पुजारी देवीसिंह जी , अपने बचपन के समय से ही इस मंदिर की पूजा करते आए है उनके अनुसार भगवान की सेवा और प्रसाद जीवन के लिए पर्याप्त सुख व आनंद का एक अद्भुत साधन है.

पुजारी देवीसिंह


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