November 6, 2020

सुरखी और बड़ा मलहरा में भाजपा की राह नहीं आसान, टिकाऊ-बिकाऊ के बीच कईयों की प्रतिष्ठा लगी दाव पर


दमोह से शंकर दुबे✍️

मध्यप्रदेश में 28 सीटों पर हुए उपचुनाव के मतदान के बाद उम्मीदवारों और जनता ने राहत की सांस ली है। बुंदेलखंड की 2 सीटों सुरखी और बड़ा मलहरा में उपचुनाव को लेकर विशेष राजनीतिक सरगर्मी बनी हुई है। इसका एक कारण यह भी है कि बुंदेलखंड की जिस बड़ा मलहरा सीट से भाजपा प्रत्याशी प्रदुम्न सिंह लोधी हैं उस सीट पर केंद्रीय पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल और भाजपा की फायर ब्रांड नेता पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। तो दूसरी ओर सिंधिया खेमे के कद्दावर नेता गोविंद सिंह राजपूत की प्रतिष्ठा सुरखी में दाव पर लगी हुई है । यहां पर मुकाबला रोचक और भी इसलिए बन गया है क्योंकि गोविंद राजपूत के साथ वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री गोपाल भार्गव तथा भूपेंद्र सिंह ने गोविंद सिंह के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी है।


सुरखी विधानसभा की बात करें तो यहां पर रोचक बात यह है कि कांग्रेस प्रत्याशी पारुल साहू और भाजपा प्रत्याशी गोविंद सिंह दोनों ही मतदान नहीं कर पाए। क्योंकि वह दोनों सागर शहर के मतदाता हैं। पारुल साहू पूर्व विधायक और आबकारी ठेकेदार संतोष साहू की राजनीतिक उत्तराधिकारी और पुत्री हैं। तो दूसरी ओर गोविंद सिंह राजपूत गोपाल भार्गव के निकटतम और राजनीतिक गुरु भी हैं। वह कांग्रेस सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं।

सुरखी में सर्वाधिक ओबीसी मतदाता हैं। उसके बाद एसटी-एससी और फिर कुछ समानांतर स्थिति में सामान्य मतदाता हैं। यहां से 15 प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रहे हैं। बताते चलें कि 2018 के उपचुनाव में गोविंद राजपूत ने भाजपा की पारुल साहू जो अब कांग्रेस की प्रत्याशी हैं को 21418 मतों से हराया था। इस बार यह अंतर कितना रहता है देखने वाली बात होगी। दोनों ही दल के प्रत्याशी तेजतर्रार और दबंग छवि वाले हैं। इसलिए यहां के मतदाताओं ने कुछ भी कहना मुनासिब नहीं समझा। वरन जिस पार्टी के प्रत्याशी ने उनके घरों पर झंडा लगा दिया तो वह उन्हीं के मतदाता बन गए।

कई घरों में ऐसा भी देखने को मिला जहां पर दोनों ही दलों के प्रत्याशियों के झंडे लगे हुए थे। यहां 2 लाख 5 हज़ार मतदाता हैं। पिछली बार यहां पर 75% से अधिक तो इस बार 72% से अधिक मतदान हुआ है । गोविंद सिंह राजपूत के लिए भाजपा की अंतर कलह नुकसानदेह साबित हो सकती है। क्योंकि गोविंद सिंह राजपूत के कारण ही वर्तमान नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह को सुरखी छोड़कर खुरई विधानसभा में अपनी जमीन तलाश करना पड़ी थी। इसके अलावा मंत्री पद की कतार में खड़े सागर विधायक शैलेंद्र जैन और नरयावली विधायक प्रदीप लारिया ने कितने मनोयोग से काम किया होगा इसे भी समझा जा सकता है? यदि गोविंद राजपूत तीसरी बार पुनः जीते तो निश्चित रूप से गोपाल भार्गव और उनके प्रतिद्वंदी भूपेंद्र सिंह के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकते हैं? इसका कारण यह है कि एक ही जिले से 33 मंत्री होने के कारण वर्चस्व की लड़ाई निश्चित रूप से बढ़ेगी।

इसके अलावा मंत्री पद की आस लगाए बैठे सागर और नरयावली विधायक के लिए भी यह राजनीतिक चोट होगी। बुंदेलखंड की दूसरी सीट बड़ा मलहरा की बात करें तो वहां पर भी स्थितियां सुरखी से कुछ इतर नहीं हैं। प्रहलाद पटेल और उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान की धड़ाधड़ सभाओं और आधे दर्जन से ज्यादा मंत्रियों विधायकों के जनसंपर्क के बाद भी स्थिति कितनी मजबूत हुई होगी इसका पता 10 तारीख को चलेगा। लेकिन यदि यहां से प्रदुम्न सिंह चुनाव हारते हैं तो यह हार उनकी व्यक्तिगत नहीं बल्कि उमा भारती और प्रहलाद पटेल के साथ प्रदेश सरकार की हार भी होगी। क्योंकि उमा भारती और प्रसाद पटेल ने लोधी समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए जिस तरह काम किया है और उन्हें चुनाव जिताने के लिए इतनी मेहनत की है वह किसी से छिपी नहीं है ।

कांग्रेस प्रत्याशी राम सिया भारती जिला प्रशासन और भाजपा पर गड़बड़ी करने के आरोप पहले भी लगा चुकी हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी शिकायतों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी यहां तक कि चुनाव के 1 दिन पूर्व तक मंत्री हरिशंकर खटीक प्रशासनिक अधिकारियों को खुलेआम हड़का चुके हैं। यह बसपा से पूर्व मंत्री अखंड प्रताप यादव की भी स्थिति अच्छी मानी जा रही है। माना जा रहा है कि 2 लोगों की लड़ाई में वह बाजी मार सकते हैं।

पिछले चुनाव में भाजपा प्रत्याशी 15779 से जीते थे। बड़ा मलहरा में सपा की उपस्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहां पर कुल 19 प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रहे हैं ।पिछली बार यहां पर 71% से अधिक मतदान हुआ था। यह 2 लाख 13 हजार मतदाता हैं। जिसमें यादव, लोधी और जैन समाज के मतदाता हार जीत का फैसला करने की भूमिका में है। बाहर हाल सुर्खी हो या बड़ा मलहरा दोनों ही विधानसभाओं में बिकाऊ नहीं टिकाऊ का नारा खूब जोर शोर से चला है। यहां तक कि चाय पान की दुकानों पर भी लोग टिकाऊ बिकाऊ की चर्चाओं को गर्म में करते रहे।

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